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Showing posts from February, 2018

सेमरा गाँव की डॉ प्रियंका कुमारी राय बनीं असिस्टेंट प्रोफेसर

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सेमरा निवासी डॉ प्रियंका कुमारी राय का चयन हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुआ है. ऐसी सफलता हासिल करके उन्होंने सभी ग्रामवासियों को गौरवान्वित होने का अवसर दिया है. डॉ प्रियंका का चयन ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के बीआरबी कॉलेज में हुआ है. उनका शोध-कार्य काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 'ग्रामीण जीवन का बदलता स्वरूप और शिवमूर्ति का कथा साहित्य' नामक विषय पर हुआ है. बड़ी बात यह है कि उनके पति डॉ अजीत कुमार राय भी असिस्टेंट प्रोफेसर हैं जो वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज में नियुक्त हैं. गौरतलब है कि डॉ अजीत को गिरमिटिया मजदूरों और भारतीय प्रवासन से संबंधित कार्यों के लिए भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद और मॉरीशस के राष्ट्रपति द्वारा पोर्ट लुईस में सम्मानित भी किया जा चुका है. डॉ प्रियंका कुमारी राय डॉ अजीत कुमार राय गाँव के इतिहास में यह अभूतपूर्व है कि एक ही परिवार के और वो भी पति-पत्नी दोनों ही प्रोफेसर के पद पर हैं. डॉ प्रियंका गाँव के श्री वंश नारायण राय और श्रीमती प्रेमशीला राय की पुत्रवधू हैं. अपने पुत्र-पुत्रवधू को आ...

खानाबदोश जीवन जीने को मजबूर कटान पीड़ित

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आज तक की रिपोर्ट: 18 मई, 2016 पहली मई की दोपहर पूर्वी उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर पर स्थित बलिया लोकसभा क्षेत्र के हैबतपुर इलाके में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी उज्ज्वला योजना का आगाज कर रहे थे वहीं हैबतपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर सेमरा गाँव के सरकारी स्कूलों में शरणार्थी के तौर पर रह रहे 500 परिवार अपनी अंधकार भरी जिंदगी से जंग लड़ रहे थे। इन्हीं में से एक 45 वर्षीया अंजू देवी हैं। गाजीपुर जिले से 30 किलोमीटर दूर मुहम्मदाबाद तहसील के गाँव शिव राय का पुरा की अंजू के पति की छह साल पहले मौत हो गई थी लेकिन उन पर उस वक्त दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब जून 2013 में गंगा में आई बाढ़ और कटान में उनका घर और पाँच बीघा जमीन सब पानी में समा गये। बेसहारा अंजू नदी के दूसरे छोर पर स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालय सेमरा में पिछले तीन साल से अपने दो बच्चों के साथ शरणार्थी बनी हुई हैं। इससे कुछ दूरी पर स्थित सेमरा प्रथम का प्राइमरी स्कूल पहली नजर में पूरी तरह शरणार्थी कैंप नजर आता है स्कूल के सबसे बड़े कमरे में पाँचवीं की कक्षाएँ चलती थीं पर अब इसमें 50 वर्षीय राजेन्द्र पटेल ...

कहानी सेमरा की

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सेमरा की भयावह स्थिती पर नजदीक से प्रकाश डाल रहे हैं  समीर कुमार राय- अस्तित्व खोने की कगार पर खड़ी देश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत: भारत की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत शेरपुर आज गंगा कटान से बुरी तरह त्रस्त है। शहीदों की ये धरती आज अपने अस्तित्व के लिए हर क्षण संघर्ष कर रही है। शेरपुर ग्राम पंचायत के सेमरा व शिव राय का पुरा गाँव का अस्तित्व लगभग खत्म होने की कगार पर है। लगभग 10000 की आबादी वाले सेमरा गाँव की हजारों एकड़ भूमि व सैकड़ों घर गंगा में विलीन हो चुके हैं शिव राय का पुरा में तो दो-चार घर ही बचे हैं वहीं सेमरा का भी आधा से ज्यादा भाग बह चुका है। बद से बदतर होती गाँव की स्थिती: सेमरा की हालत ऐसी है कि आप कभी कल्पना भी नहीं कर सकते। कटान में घर गिरने के बाद जिनके पास जमीन बची थी उन्होंने तो जैसे तैसे झुग्गी झोपड़ी डालकर अपने रहने की व्यवस्था कर ली, जिनके पास पैसे थे और जमीन नहीं थी वो दूसरे गाँवों में जमीन खरीदकर बस गये लेकिन उन बेसहारों का क्या जिनके पास न तो जमीन है और न पैसे हैं आज पाँच सालों से ऐसे लोग दर-बदर की ठोकरें खा रहे हैं। कभी सेमरा के प्राथमिक विद्यालय म...

क्रांतिकारी विचारों के धनी थे बद्री राय

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समीर कुमार राय- आईए जानते हैं गाँव के एक ऐसे इंसान के बारे में जिनके अंदर साहस और देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी तथा जिन्होंने अपने विचारों और सिद्धांतो से कभी समझौता नहीं किया। सेमरा के ही रहने वाले श्री बद्री राय बंगाल पुलिस में कार्यरत थे और अभी देश आजाद नहीं हुआ था लेकिन पूरे देश में क्रांति की लहरें धधक रही थी। बच्चे, बूढ़े और युवा देश की आजादी के लिए निरन्तर संघर्षरत थे। उस समय गाँव के बहुत सारे लोग बंगाल पुलिस में सेवारत थे। बारीसाल, जो कि आज बांग्लादेश का अंग है, में बद्री राय की पोस्टिंग थी। उसी समय अग्रेजों ने कुछ क्रांतिकारियों को पकड़ लिया और बद्री राय को ही उनके ऊपर गोली चलाने का आदेश दिया गया। अपने ही देश के लिए लड़ रहे अपने ही भाईयों पर गोली चलाना उन्हें स्वीकार नहीं था अत: उन्होंने हवा में फायर किया। पास में ही अंग्रेज हाकिम बैठा था उसने सोचा कि शायद गलती से हो गया होगा लेकिन तीन बार जब यही बात हुई तो कड़कती आवाज में उसने इसका कारण पूछा। श्री राय ने साफ शब्दों में कहा कि चाहे कुछ भी हो जाय वो अपने ही भाईयों पर कत्तई गोली नहीं चला सकते। उनकी इस गुस्ताखी की स...

बाइस्कोप

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गुजरे जमाने के गाँवों के सिनेमा यानि बाइस्कोप की यादें ताजा कर रहे हैं हरेराम राय- हमारे गाँव में पुराने जमाने में भी कभी-कभी गंवई लोग सिनेमा से रुबरू हुआ करते थे। सिनेमा कोई आज के जमाने की नई चीज थोड़े है ये तो वर्षो से चला आ रहा है। पुराने जमाने में सिनेमा खुद बखुद गाँव के गली-गली तक फैला हुआ था ये बात अलग है कि आधुनिक सिनेमा की पहुँच उस कदर नहीं है जिस उत्साह और उमंग के साथ पुराने ज़माने के लोग सिनेमा देखते थे। आइये परिचय कराते हैं कि गुजरे जमाने में गाँवों का सिनेमा कैसा होता था। जी हाँ उसे लोग बाइस्कोप कहा करते थे दादा परदादा के जमाने में बाइस्कोप देख कर लोग मनोरंजन किया करते थे। बाइस्कोप वाला लोगों को बाइस्कोप देखने के लिये बोलता जाता था- "दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, पटना का गोलघर देखो, नौ मन की बुलाकी देखो, देखो जी देखो बाइस्कोप देखो। देखो, देखो, देखो, देखो, दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, आगरे का ताजमहल, बम्बई का बाजार देखो, देखो, देखो, देखो…" बाइस्कोप में चित्र श्रृंखला के माध्यम से कथा दिखाई जाती थी और इस यंत्र को चलाने वाला उस कथा को गाकर सुनाता था। ...