सेमरा गाँव की डॉ प्रियंका कुमारी राय बनीं असिस्टेंट प्रोफेसर

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सेमरा निवासी डॉ प्रियंका कुमारी राय का चयन हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुआ है. ऐसी सफलता हासिल करके उन्होंने सभी ग्रामवासियों को गौरवान्वित होने का अवसर दिया है. डॉ प्रियंका का चयन ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के बीआरबी कॉलेज में हुआ है. उनका शोध-कार्य काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 'ग्रामीण जीवन का बदलता स्वरूप और शिवमूर्ति का कथा साहित्य' नामक विषय पर हुआ है. बड़ी बात यह है कि उनके पति डॉ अजीत कुमार राय भी असिस्टेंट प्रोफेसर हैं जो वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज में नियुक्त हैं. गौरतलब है कि डॉ अजीत को गिरमिटिया मजदूरों और भारतीय प्रवासन से संबंधित कार्यों के लिए भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद और मॉरीशस के राष्ट्रपति द्वारा पोर्ट लुईस में सम्मानित भी किया जा चुका है. डॉ प्रियंका कुमारी राय डॉ अजीत कुमार राय गाँव के इतिहास में यह अभूतपूर्व है कि एक ही परिवार के और वो भी पति-पत्नी दोनों ही प्रोफेसर के पद पर हैं. डॉ प्रियंका गाँव के श्री वंश नारायण राय और श्रीमती प्रेमशीला राय की पुत्रवधू हैं. अपने पुत्र-पुत्रवधू को आ...

क्रांतिकारी विचारों के धनी थे बद्री राय

समीर कुमार राय-

आईए जानते हैं गाँव के एक ऐसे इंसान के बारे में जिनके अंदर साहस और देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी तथा जिन्होंने अपने विचारों और सिद्धांतो से कभी समझौता नहीं किया। सेमरा के ही रहने वाले श्री बद्री राय बंगाल पुलिस में कार्यरत थे और अभी देश आजाद नहीं हुआ था लेकिन पूरे देश में क्रांति की लहरें धधक रही थी। बच्चे, बूढ़े और युवा देश की आजादी के लिए निरन्तर संघर्षरत थे।

उस समय गाँव के बहुत सारे लोग बंगाल पुलिस में सेवारत थे। बारीसाल, जो कि आज बांग्लादेश का अंग है, में बद्री राय की पोस्टिंग थी। उसी समय अग्रेजों ने कुछ क्रांतिकारियों को पकड़ लिया और बद्री राय को ही उनके ऊपर गोली चलाने का आदेश दिया गया। अपने ही देश के लिए लड़ रहे अपने ही भाईयों पर गोली चलाना उन्हें स्वीकार नहीं था अत: उन्होंने हवा में फायर किया। पास में ही अंग्रेज हाकिम बैठा था उसने सोचा कि शायद गलती से हो गया होगा लेकिन तीन बार जब यही बात हुई तो कड़कती आवाज में उसने इसका कारण पूछा। श्री राय ने साफ शब्दों में कहा कि चाहे कुछ भी हो जाय वो अपने ही भाईयों पर कत्तई गोली नहीं चला सकते। उनकी इस गुस्ताखी की सजा ये भी हो सकती थी कि क्रांतिकारियों के साथ उन्हें भी गोली मार दी जाती लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। अंतत: उन्हें इसकी सजा तो नहीं दी गयी लेकिन तत्काल उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। नौकरी छोड़कर घर आकर आजीवन उन्होंने गृहस्थ का जीवन जीया लेकिन अपने स्वाभिमान पर उन्होंने आँच नहीं आने दी।


(लेखक इंजीनियरिंग के छात्र, युवा विश्लेषक तथा आलोचक हैं)

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