सेमरा गाँव की डॉ प्रियंका कुमारी राय बनीं असिस्टेंट प्रोफेसर

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सेमरा निवासी डॉ प्रियंका कुमारी राय का चयन हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुआ है. ऐसी सफलता हासिल करके उन्होंने सभी ग्रामवासियों को गौरवान्वित होने का अवसर दिया है. डॉ प्रियंका का चयन ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के बीआरबी कॉलेज में हुआ है. उनका शोध-कार्य काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 'ग्रामीण जीवन का बदलता स्वरूप और शिवमूर्ति का कथा साहित्य' नामक विषय पर हुआ है. बड़ी बात यह है कि उनके पति डॉ अजीत कुमार राय भी असिस्टेंट प्रोफेसर हैं जो वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज में नियुक्त हैं. गौरतलब है कि डॉ अजीत को गिरमिटिया मजदूरों और भारतीय प्रवासन से संबंधित कार्यों के लिए भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद और मॉरीशस के राष्ट्रपति द्वारा पोर्ट लुईस में सम्मानित भी किया जा चुका है. डॉ प्रियंका कुमारी राय डॉ अजीत कुमार राय गाँव के इतिहास में यह अभूतपूर्व है कि एक ही परिवार के और वो भी पति-पत्नी दोनों ही प्रोफेसर के पद पर हैं. डॉ प्रियंका गाँव के श्री वंश नारायण राय और श्रीमती प्रेमशीला राय की पुत्रवधू हैं. अपने पुत्र-पुत्रवधू को आ...

सेमरा के इन विस्थापितों की सुध लेने वाला कोई नहीं

आज तक की रिपोर्ट:
4 मार्च, 2017

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जहाँ राजनीतिक दल मतदाताओं को रिझाने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपना रहे हैं, वहीं गाजीपुर जनपद के मोहमदाबाद तहसील के सेमरा गाँँव के लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। साल 2013 में हुए गंगा के कटान में सेमरा गांव आंशिक रूप से अपना वजूद खो चुका है ऐसे में सेमरावासी विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर हैं। कुल विस्थापित 558 लोगों में से 378 लोग पिछले कई सालों से आसपास के प्राइमरी और मिडिल स्कूल में आसरा लिए हुए हैं आज तक की टीम ने ऐसे ही एक स्कूल का जायजा लिया।

मिडिल स्कूल के परिसर में खेलते बच्चे सेमरा से विस्थापित हुए परिवारों के हैं। आज कल स्कूल में विधानसभा चुनाव के कारण पढ़ाई का काम स्थगित है आम दिनों में एक क्लास रूम में 3 से 4 परिवार के सदस्यों को गुजर बसर करना पड़ता है। अंदाज़ा लगाइए जब स्कूल चल रहा होता है, तो क्या नज़ारा होता होगा बाहर मैदान में गाय, मुर्गे, बकरी और विस्थापितों के छोटे बच्चे और महिलाएँ बगल में होते होंगे।

अब चुनाव में स्कूल खाली करने के फरमान ने इनकी परेशानी में इजाफा कर दिया है ऐसे में सेमरा विस्थापितों का दर्द छलक ही आता है। वह कहते हैं, 12 घंटे की मजदूरी करके 200 रुपये मिलते हैं, कहाँ जाएंगे? हमारा गाँँव तो गंगा में समा गया, सरकार से भी कुछ नहीं मिलता। इन्हीं विस्थापितों में शामिल अमरनाथ कहते हैं, हम चुनाव के दिन बाहर चले जाएंगे लेकिन हमारे जानवर और बच्चों का क्या होगा?

स्कूल के कमरे में ही पुआल के ऊपर फटा कंबल बिछाकर बिस्तर बनाए महिला कहती हैं, बस किसी तरह गुज़र रही है। इन 100 परिवारों की महिलाओं ने अपने लिए मजबूरी में बाथरूम तैयार किया है, जो किसी को भी शर्मसार कर दे। बस लकड़ी की टेढ़ी-मेढ़ी 3 फुट की चारदीवारी फटी धोतियों से ढंककर इज़्ज़त बचाने का साधन है।

सरकार ने सेमरा विस्थापितों के पुनर्वास के लिए पास के ही शेरपुर गांव में जमीन की पैमाइश की है लेकिन उस जमीन को मुआवजे के तौर पर विस्थापितों ने लेने से इनकार कर दिया है। स्थानीय पत्रकार गोपाल बताते हैं कि सरकार ने जिस जमीन पर पुनर्वास की योजना बनाई है वो गंगा नदी के किनारे का इलाका है, जो कि बाढ़ और कटान प्रभावित है ऐसे में इनकी समस्या का स्थाई निदान होता नहीं दिख रहा।

वहीं गाँँव बचाओ संघर्ष समिति के प्रेमनाथ गुप्ता विस्थापन को लेकर विगत सालों में सरकार की नीतियों को सराहना करते हैं। गुप्ता का कहना है कि 2012 के पहले विस्थापन के लिए जमीन आवंटन की कोई योजना नहीं थी लेकिन अब सरकारी नियम के अनुसार विस्थापित पुनर्वास के लिए जमीन पाने के हकदार हैं लेकिन सेमरा विस्थापितों को पुनः बाढ़ प्रभावित इलाके में जमीन आवंटित करके सरकार ने उनके साथ भद्दा मजाक किया है।

इस इलाके में 8 मार्च को मतदान होना है प्रशासन ने विस्थापितों से स्कूल खाली करने को कहा है ऐसे में सेमरा के ये विस्थापित मतदान वाले दिन अपने मूल गाँव में वोट देने जाने का हवाला देते हुए स्कूल परिसर खाली करने पर राजी हो गए हैं।

विधानसभा में बह रही सियासी बयार में जहां वादों और आश्वासन की झड़ियां लगी हुई हैं वहीं राजनीतिक उदासीनता के शिकार ये लोग उस दिन के इंतज़ार में हैं जब उनके ऊपर से विस्थापित का तमगा हटेगा और ये पुनर्वासित होकर नए जीवन की शुरुआत कर पाएंगे।


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